God
25 Sep

नरेश सिंगल 
नवरात्र महज धार्मिक परंपरा नहीं है। न ही नवरात्र का महत्‍व उपवास करने और अखंड ज्‍यो‍त जलाने तक सीमित है। नवरात्र आदि शक्ति की आराधना का वह पर्व है, जिसका विशेष आध्‍यात्मिक महत्‍व है। यह पर्व आत्‍म सयंम और सर्वशक्तिमान परमात्‍मा से जुडाव की पद्धति सिखाता है। बात चाहे उपवास की हो, पूजा-ध्‍यान की या फिर सयंमित आचार-व्‍यवहार की। अगर आप भी नवरात्र में आध्‍यात्मिक लाभ लेना चाहते हैं, तो भूलकर भी ये गलतियां न करें।
अक्‍सर देखा जाता है कि भावना और पूर्ण विधि-विधान से पूजा करने के बावजूद आत्मिक संतोष की प्राप्ति नहीं होती। इसका मुख्‍य कारण है गलत दिशा या जोन में बैठकर पूजा करना। अगर आप दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम में बैठकर पूजा-ध्‍यानादि करते हैं, तो अनजाने में ही आप स्‍वयं को शक्ति से डिस्‍कनेक्‍ट कर लेते हैं। ये दिशाएं पितरों की दिशाएं हैं। इन दिशाओं में पूजा करने का मतलब है अपनी भक्ति का विसर्जन करना।

दुर्भाग्‍य है कि आज हमें हर चीज अपने सुविधा के अनुसार चाहिए। इसीलिए हमने मंदिर भी घर में बना लिया है और भगवान को भी वहीं विराजमान कर लिया है। मंदिर और पूजा ही नहीं, मेडिटेशन भी आजकल कोचिंग सेंटर से ट्युशन पढने जैसा हो गया है।
आश्चर्य की बात यह है कि जो 4 दिन पहले विद्यार्थी था अब वह मास्टर हो गया है, ओर 5-6 दिन का कोर्स करके तो वह एक्स्पर्ट बन जाता है। स्‍वयं से जुडने के लिए घर में मंदिर बनाने की आवश्‍यकता नहीं है। इसके लिए जरूरत है स्‍वयं से जुडने की, स्‍वयं को जानने की। नवरात्र स्‍वयं का जानने के लिए आदर्श समय है।
पूजा या ध्‍यान का मतलब महज भगवान की प्रतिमा के सामने कुछ विधियां पूर्ण करना नहीं है। पूजा का वास्‍तविक मतलब है स्‍वयं से जुडना। प्राचीन काल में बने कई मंदिरो में मान्यता होती है की वहाँ जो भी मन्नत माँगी जाती है वो पूर्ण होती है, यह कोई अंध विश्वास नहीं बल्कि वहाँ का एनर्जी लेवल है जो सही वास्तु के चलते इतना स्ट्रोंग है की आप ख़ुद से व ईश्वर से उस परिवेश में आते ही कनेक्ट हो जाते हो।

अज्ञान या आलस्‍य के चलते हम घर में ही मंदिर की स्‍थापना कर लेते हैं। ऐसा नहीं करना चाहिए। घर में मंदिर नहीं बनाना चाहिए। हां, पूजा स्‍थल बनाया जा सकता है, लेकिन उसके अपने कई नियम हैं। इन नियमों की जानकारी के अभाव में हम गलत दिशा में या गलत तरीके से पूजा स्‍थल बनाते हैं तो आर्थिक तंगी, मानसिक अशांति, पारीवारिक कलह आदि तकलीफों से गुजरना पडता है।
घर में जगह-जगह भगवान की तस्‍वीर, कैलेंडर आदि नहीं लगाने चाहिएं।
शोकेस में गणेश जी की तस्‍वीर या प्रतिमा न रखें।
घर में घंटी बजाकर पूजा नहीं करनी चाहिए।
पूजा स्‍थल के पर्दे लाल, भगवा व केसरी न हों।
ईशान कोण में जूते व साफ-सफाई करने में इस्‍तेमाल आने वाला सामान न रखें।

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